History Gala: July
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Wednesday, July 14, 2021

ऑपरेशन ब्लू स्टार


'ऑपरेशन ब्लू स्टार' भारतीय सेना द्वारा अमृतसर स्थित  स्वर्ण मंदिर परिसर को खालिस्तान समर्थक जनरैल सिंह भिंडरावाले और उनके समर्थकों से मुक्त कराने के लिए चलाया गया अभियान था। ये भारत के इतिहास में एक ऐसी घटना जिसने पूर्व पीएम इंदिरा गांधी की मौत की पटकथा लिखी थी क्योंकि ये ही उनकी हत्या का मुख्य कारण था, जिसने देश की राजनीति की दिशा को ही मोड़ दिया था।

क्यों चला था 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' 

'ऑपरेशन ब्लू स्टार' उनके खात्मे के लिए चलाया गया था, जो अलगाववादी विचारधारा को जन्म दे रहे थे। पंजाब में अलग राज्य की मांग की समस्या ने सिर उठाना शुरू कर दिया था। पंजाब समस्या की शुरुआत 1970 के दशक से अकाली राजनीति में खींचतान और अकालियों की पंजाब संबंधित मांगों को लेकर शुरु हुई थी। पहले साल 1973 में और फिर 1978 में अकाली दल ने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पारित किया। मूल प्रस्ताव में सुझाया गया था कि भारत की केंद्र सरकार का केवल रक्षा, विदेश नीति, संचार और मुद्रा पर अधिकार हो जबकि अन्य विषयों पर राज्यों को पूर्ण अधिकार हों। अकाली ये भी चाहते थे कि भारत के उत्तरी क्षेत्र में उन्हें स्वायत्तता मिले।

यही वह वक्त भी था जब पंजाब में अकाली दल कांग्रेस का विकल्प बनकर उभर चुका था, इंदिरा गांधी ने इसके जवाब के तौर पर सरदार ज्ञानी जैल सिंह को पंजाब के मुख्यमंत्री के तौर पर खड़ा किया। जैल सिंह का बस एक ही मकसद था-शिरोमणि अकाली दल का सिखों की राजनीति में वर्चस्व कम करना। इन सब हालात के बीच एक शख्स का उदय हुआ जिसका नाम था जरनैल सिंह भिंडरावाले, जिसे पहले अकाली दल के काट के लिए लाया गया था लेकिन बाद में वो सरकार के लिए चुनौती बन गया।

खालिस्तान आंदोलन का परिचय

आजादी के बाद खालिस्तान का आंदोलन शुरू हो गया था। यह आंदोलन भारत से पंजाब को अलग करके खालिस्तान नाम से एक नए देश बनाने के लिए किया गया था। इससे भारत में आतंक के एक नए अध्याय की शुरुआत हुई जिसका समापन 6 जून, 1984 को ऑपरेशन ब्लू स्टार के साथ हुआ। हालांकि इस ऑपरेशन के साथ सिख अलगाववाद करीब-करीब खत्म हो गया लेकिन अभी दुनिया भर में कई संगठन हैं जो पंजाब को अलग करने की मांग करते हैं।

क्यों हुआ ऑपरेशन ब्लूस्टार?

1983 में पंजाब पुलिस के डीआईजी एएस अटवाल ही हत्‍या से माहौल गर्मा गया। उसी साल जालंधर के पास बंदूकधारियों ने पंजाब रोडवेज की बस में चुन-चुनकर हिंदुओं की हत्‍या कर दी। इसके बाद विमान हाईजैक हुए। स्थिति काबू से बाहर हो गई और केंद्र सरकार ने राज्‍य में राष्‍ट्रपति शासन लगा दिया। अब तक स्‍वर्ण मंदिर को अपना ठिकाना बना चुका भिंडरावाला सरकार के निशाने पर आ चुका था और स्‍वर्ण मंदिर को चरमपंथियों के कब्‍जे से मुक्‍त कराने के लिए ऑपरेशन ब्‍लूस्‍टार प्‍लान किया गया।

3 जून की रात

केंद्र सरकार ने भारतीय थल सेना को स्‍वर्ण मंदिर को स्‍वतंत्र कराने का जिम्‍मा सौंपा। जनरल बरार को ऑपरेशन ब्‍लूस्‍टार की कमान सौंपी। 3 जून को सेना ने अमृतसर में प्रवेश किया। चार जून की सुबह गोलीबारी शुरू हो गई। सेना को चरमपंथियों की ताकत का अहसास हुआ तो अगले ही दिन टैंक और बख्‍तरबंद गाड़ियों का उपयोग किया गया। 6 जून की शाम तक स्‍वर्ण मंदिर में मौजूद भिंडरावाला व अन्‍य चरमपंथियों को मार गिराया गया। लेकिन तब तक मंदिर और जानमाल का काफी नुकसान हो चुका था।

ऑपरेशन के बाद सरकार ने श्वेत पत्र जारी कर बताया कि ऑपरेशन में भारतीय सेना के 83 सैनिक मारे गए और 248 अन्य सैनिक घायल हुए। इसके अलावा 492 अन्य लोगों की मौत की पुष्टि हुई और 1,592 लोगों को हिरासत में लिया गया। 31 अक्‍टूबर 1984 को तत्‍कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्‍या कर दी गई और दंगे भड़क गए।

क्या हुआ खालिस्तान का?

1990 के दशक में खालिस्तान की मांग कमजोर पड़ती गई। हालांकि ऑपरेशन ब्लू स्टार की तारीख पर आज भी हर साल पंजाब में विरोध प्रदर्शन होता है। ब्रिटेन, कनाडा और अमेरिका में रह रहे सिख समुदायों में अभी भी अलग खलिस्तान को लेकर मांग उठती रही है। समझा जाता है कि भारत से बाहर दो से तीन करोड़ सिख रह रहे हैं। उनमें से ज्यादातर का भारत के पंजाब से कोई न कोई जुड़ाव है।


Monday, July 12, 2021

ऑपरेशन शक्ति - पोखरण की कहानी

पोखरण-II
पोखरण-II

पोखरण-II पांच परमाणु बम परीक्षण विस्फोटों की श्रृंखला थी जो भारत द्वारा मई 1998 में भारतीय सेना के पोखरण टेस्ट रेंज में किए गए थे। यह भारत का दूसरा प्रयास था जो मई 1974 में आयोजित किए गए पहले परीक्षण,  "स्माइलिंग बुद्धा" के बाद सफल हुआ।

पोखरण II 

आज से बीस साल पहले तत्कालीन प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्रा की अचानक घोषणा ने भारत की दुनिया को उलट कर रख दिया था। 11th और 13th मई को, भारत ने पांच परमाणु परीक्षणों का एक सेट किया, जिसने दुनिया को चौंका दिया।उन परीक्षणों ने भारत को एक ऐसी सड़क पर खड़ा कर दिया, जिससे भारत को केवल एक परमाणु शक्ति ही नहीं, बल्कि वैश्विक मान्यता मिली।बहुत सरलता से, इसने भारत के लिए जगह बनाने के लिए वैश्विक उच्च तालिका प्राप्त करने में मदद की।

लेकिन क्या आप इस बात को जानते हैं कि अमेरिका सहित भारत के सभी शत्रु देश भारत को इस परमाणु परीक्षण को ना करने देने के लिए पूरी तरह से एकजुट थे l अमेरिका की ख़ुफ़िया एजेंसी CIA  भारत की हर एक हरकत पर गहरी नजर रखे हुए थी और उसने अरबों रुपये खर्च करके पोखरण पर नजर रखने वाले चार सैटेलाइट लगाए थे, ये ऐसे सैटेलाइट थे जिनके बारे में कहा जाता था कि ये जमीन पर खड़े भारतीय सैनिकों की घड़ी में हो रहा समय भी देख सकते थे l लेकिन भारत ने CIA  और इन सभी सैटेलाइटस को मात दे दी l

आइये अब जानते हैं कि भारत ने कैसे ये परीक्षण किये थे?

परीक्षण की जगह थी  पोखरण | भारत ने इस जगह को इसलिए चुना था क्योंकि यहाँ पर मानव बस्ती बहुत दूर थी l

वैज्ञानिकों ने इस मिशन को पूरा करने के लिए रेगिस्तान में बालू के बड़े बड़े कुए खोदे और इनमे परमाणु बम रखे गए और फिर कुओं को बालू से ढका गया. इन कुओं के ऊपर बालू के पहाड़ बना दिए गए जिन पर मोटे मोटे तार निकले हुए थे जिनमे आग लगायी गयी और बहुत जोर का धमाका हुआ l

 इस धमाके के कारण  एक ग्रे रंग का बादल बन गया थाl इससे कुछ दूरी पर खड़ा 20 वैज्ञानिकों का समूह इस पूरे घटना क्रम पर नजर रखे हुए था जैसे ही यह विस्फोट हुआ तो एक वैज्ञानिक ने कहा कि , 'कैच अस इफ यू कैन', अर्थात 'अगर पकड़ सको तो हमें पकड़ो'l यह अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी को खुली चुनौती के तौर पर बोला गया था l

इस पूरे प्रोजेक्ट के दौरान वैज्ञानिक एक दूसरे से कोड भाषा में बात करते थेl इस पूरी प्रक्रिया के दौरान वैज्ञानिकों के बहुत से  झूठे नाम भी रखे गए थे और ये नाम इतने सारे हो चुके थे कि कभी-कभी तो साथी वैज्ञानिक एक दूसरे के नाम भी भूल जाते थेl  सभी को आर्मी की वर्दी में परीक्षण स्थल पर ले जाया जाता था ताकि ख़ुफ़िया एजेंसी CIA को यह अंदेशा हो कि आर्मी के जवान ड्यूटी कर रहे हैं l

पांच परमाणु उपकरणों को ऑपरेशन शक्ति के दौरान विस्फोट किया गया।इस परीक्षण की सफलता पर भारतीय जनता ने भरपूर प्रसन्नता जताई लेकिन दुनिया के दूसरे देशों में इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। इजरायल ही एकमात्र ही ऐसा देश था, जिसने भारत के इस परीक्षण का समर्थन किया था। इस परीक्षण के बाद अमेरिका, जापान, फ़्रांस, ब्रिटेन सहित लगभग सभी विकसित देशों ने भारत के खिलाफ प्रतिबन्ध लगाये थे l

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Wednesday, July 7, 2021

जगन्नाथ मंदिर के रहस्य

 

जगन्नाथ मंदिर
जगन्नाथ मंदिर

पुरी का प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर भक्तों के लिए महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह भारत में चार धाम तीर्थ स्थलों में से एक है, और यह वार्षिक रथ उत्सव या रथ यात्रा के लिए भी प्रसिद्ध है।मान्यता है कि भगवान विष्णु जब चारों धाम पर बसे तो सबसे पहले बदरीनाथ गए और वहां स्नान किया, इसके बाद वो गुजरात के द्वारिका गए और वहां कपड़े बदले.द्वारिका के बाद ओडिशा के पुरी में उन्होंने भोजन किया और अंत में तमिलनाडु के रामेश्वरम में विश्राम किया. पुरी में भगवान श्री जगन्नाथ का मंदिर है. 

पुरी के इस मंदिर में भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बालभद्र और बहन सुभद्रा की काठ (लकड़ी) की मूर्तियां हैं. लकड़ी की मूर्तियों वाला ये देश का अनोखा मंदिर है.जगन्नाथ मंदिर की ऐसी तमाम विशेषताएं हैं, साथ ही मंदिर से जुड़ी ऐसी कई कहानियां हैं जो सदियों से रहस्य बनी हुई हैं.

मंदिर से जुड़ी एक मान्यता है कि जब भगवान कृष्ण ने अपनी देह का त्याग किया और उनका अंतिम संस्कार किया गया तो शरीर के एक हिस्से को छोड़कर उनकी पूरी देह पंचतत्व में विलीन हो गई . मान्यता है कि भगवान कृष्ण का हृदय एक जिंदा इंसान की तरह ही धड़कता रहा .कहते हैं कि वो दिल आज भी सुरक्षित है और भगवान जगन्नाथ की लकड़ी की मूर्ति के अंदर है.

जगन्नाथ मंदिर के बारे में रोचक तथ्य

इस मंदिर की कुछ विशेष खासियत है जिसके कारण पर्यटक जगन्नाथ पुरी मंदिर का दर्शन करने के लिए आते हैं। आइये जानते हैं जगन्नाथ मंदिर के कुछ रोचक तथ्यों के बारे में।

  • जगन्नाथ मंदिर की विशेषता यह है कि मंदिर के ऊपर लगा झंडा हमेशा हवा के उल्टी दिशा में लहराता है। ऐसा प्राचीन काल से ही हो रहा है लेकिन अभी तक इसके पीछे के वैज्ञानिक कारणों के बारे में पता नहीं चल पाया है। श्रद्धालुओं के लिए सबसे ज्यादा आश्चर्यजनक बात है।
  • जगन्नाथ मंदिर के शीर्ष पर सुदर्शन चक्र लगा हुआ है। यह अष्टधातु से बना है, इसे नीलचक्र के नाम से भी जाना जाता है। लेकिन इसकी विशेषता यह है कि आप पुरी के किसी भी स्थान से खड़े होकर इस चक्र को देखें वह हमेशा आपको अपने सामने ही दिखायी देगा। यह वास्तव में आश्चर्य का विषय है, जो इसे खास भी बनाता है।
  • मंदिर के ऊपर लगा झंडा रोजाना शाम को बदला जाता है। खास बात यह है कि इसे बदलने वाला व्यक्ति उल्टा चढ़कर झंडे को बदलता है। जिस समय झंडा बदला जाता है, मंदिर के प्रांगण में इस दृश्य को देखने वालों की भारी भीड़ जमा होती है। झंडे के ऊपर भगवान शिव का चंद्र बना होता है।
  • मंदिर परिसर में पुजारियों द्वारा प्रसादम को पकाने का अद्भुत और पारंपरिक तरीका है। प्रसाद पकाने के लिए सात बर्तनों को एक दूसरे के ऊपर रखा जाता है और लकड़ी का उपयोग करके इसे पकाया जाता है। ऊपर के बर्तन का प्रसाद सबसे पहले और बाकी अंत में पकता है।
  • जगन्नाथ पुरी में हवा की दिशा में भी विशेषता देखने को मिलती है। अन्य समुद्री तटों पर प्रायः हवा समुद्र की ओर से जमीन की ओर आती है लेकिन पुरी के समुद्री तटों पर हवा जमीन से समुद्र की ओर आती है। इसके कारण पुरी अनोखा है।
  • आमतौर पर किसी भी मंदिर के गुंबद की छाया उसके प्रांगण में बनती है। लेकिन जगन्नाथ पुरी मंदिर के गुंबद की छाया अदृश्य ही रहती है। मंदिर के गुंबद की छायी लोग कभी नहीं देख पाते हैं।
  • वैसे तो हम अक्सर आकाश में पक्षियों को उड़ते हुए देखते हैं। लेकिन जगन्नाथ मंदिर की विशेषता यह है कि इस मंदिर के गुंबद के ऊपर से होकर कोई पक्षी नहीं उड़ता है और यहां तक कि हवाई जहाज भी मंदिर के ऊपर से होकर नहीं गुजरता है। अर्थात् भगवान से ऊपर कुछ भी नहीं है।
  • हिंदू पौराणिक कथाओं में भोजन को बर्बाद करना एक बुरा संकेत माना जाता है। मंदिर के संचालक इसका अनुसरण करते है। मंदिर जाने वाले लोगों की कुल संख्या हर दिन 2,000 से 2, 00,000 लोगों के बीच होती है। लेकिन मंदिर का प्रसादम रोजाना इस चमत्कारिक ढंग से तैयार किया जाता है कि कभी भी व्यर्थ नहीं होता है और ना ही कम पड़ता है। इसे प्रभु का चमत्कार माना जाता है।